फ्रांस द्वारा भारत को उपहार स्वरूप निशुल्क दिए गए 32 जगुआर युद्धक विमान तथा 2 मिराज युद्धक विमान की खबर पर कांग्रेसी नेताओं प्रवक्ताओं की पहली प्रतिक्रिया यह आयी कि फ्रांस ने जो जहाज दिए हैं वो 30-35 साल पुराने हैं और कूड़े में फेंक देने लायक हैं।
मैँ कांग्रेसी नेताओं प्रवक्ताओं की बात से सहमत होते हुए उनसे केवल यह जानना चाहता हूं, और केवल मैं ही नहीं पूरा देश उनसे यह जानना चाहेगा कि...
फ्रांस द्वारा भारत को दिए गए 30-35 वर्ष पुराने कूड़े सरीखे 34 युद्धक विमानों के लिए भारत ने तो एक पैसा नहीं दिया। उसे यह जहाज मुफ्त में मिले। अतः देश का तो कोई नुकसान नहीं हुआ लेकिन कांग्रेस यह बताए कि 2013 में उसकी सरकार ने एक 31 वर्ष पुराने युद्धक जलपोत को 230.30 करोड़ डॉलर (तब के अनुसार 14,227 करोड़ रूपये) में क्यों खरीदा था.? क्योंकि कांग्रेस के ही अनुसार यदि 30-35 वर्ष पुराने जगुआर और मिराज विमान कूड़े में फेंक दिए जाने लायक हैं तो फिर 31 वर्ष पुराना विमान वाहक जलयान एडमिरल गोर्शकोव भी कूड़े में फेंक देने लायक ही रहा होगा।
मोदी सरकार ने तो कूड़ा मुफ्त में प्राप्त किया लेकिन कांग्रेस ने देश के खजाने से 14 हज़ार करोड़ से ज्यादा रुपये खर्च कर के कूड़ा खरीदा था।
मोदीराज और कांग्रेस राज में यही फर्क है...!!!
एडमिरल गोर्शकोव की खरीद से सम्बन्धित खबर की पुष्टि इस लिंक को क्लिक कर के पढ़िए। 974 मिलियन डालर का सौदा 2.35 बिलियन डालर में किया
Wednesday, July 25, 2018
कूड़ा खरीदने के लिए कांग्रेस ने 14 हज़ार करोड़ रूपये क्यों खर्च किये थे.?
ख़बरों की दुनिया की तंग पगडंडियों, संकरे अँधेरे रास्तों तथा चकाचौंध राजमार्गों से साक्षात्कार करती सक्रिय पत्रकारिता की लगभग ढाई दशक लम्बी यात्रा के पश्चात् अब स्वतन्त्र लेखन के पड़ाव पर हूं.
राष्ट्रवादी दृष्टिकोण वाली मेरी लेखनी का एकमात्र उद्देश्य "जनहित की बात, राष्ट्रहित के साथ" करना है.
Saturday, June 16, 2018
पराक्रमी सरकार और पेशाबी सरकार में यह फर्क होता है
अक्टूबर 2014 में देवेन्द्र फड़नवीस ने जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी उस समय (2015 की गर्मियों) में विदर्भ समेत महाराष्ट्र के सूखा पीड़ित क्षेत्रों के हज़ारों गांवों में 6140 टैंकरों द्वारा पानी की आपूर्ति होती थी। इसबार (2018 में) समाप्ति की ओर बढ़ रहे गर्मी के इस पूरे मौसम के दौरान पूरे महाराष्ट्र के सभी गांवों में पानी की आपूर्ति के लिए केवल 152 टैंकरों की जरूरत पड़ी। तीन वर्षों में टैंकरों से पानी की आपूर्ति 97.5% खत्म हो चुकी है। इसका मुख्य कारण मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस द्वारा शुरू किये गए जलयुक्त शिविर अभियान हैं जिसके कारण महाराष्ट्र में सदियों से हर वर्ष सूखे की विभीषका झेलते आ रहे 12000 से अधिक गांव पिछले 3 वर्षों में जल अकाल की समस्या से सदा के लिए मुक्त हो चुके हैं। यह छोटी मोटी नहीं बल्कि ऐतिहासिक सफलता है। इसका जबरदस्त प्रचार होना चाहिए ताकि देश के अन्य क्षेत्र भी इससे प्रेरणा ले सकें।
ध्यान रहे कि अक्टूबर 1999 में महाराष्ट्र में कांग्रेस+एनसीपी गठबन्धन की सरकार बनी थी। उस गठबन्धन सरकार ने 15 साल शासन किया। उस गठबन्धन सरकार के 13 वर्ष के कार्यकाल के बाद भी विदर्भ में मौजूद रही सूखे और अकाल की विकराल समस्या के समाधान की मांग लेकर किसान जब उस गठबन्धन सरकार के तत्कालीन सिंचाई मंत्री अजित पवार के पास गए थे तो अजित पवार ने उन्हें टका से जवाब दिया था कि अगर पानी नहीं बरसा है तो..... #क्या_अपने_पेशाब_से_डैम_भर_दूं।
महाराष्ट्र समेत सारे देश में यह शर्मनाक खबर देखी सुनी और पढ़ी थी।
अतः मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस ने अपने परिश्रम पराक्रम से यह उदाहरण प्रस्तुत किया है कि पराक्रमी सरकार और पेशाबी सरकार में यह फर्क होता है।
लेकिन न्यूजचैनलों के लिए इतनी बड़ी उपलब्धि कोई खबर ही नहीं है।
मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस के जलयुक्त शिविर अभियान को मिली सफलता की पूरी खबर इस लिंक को क्लिक कर के पढ़िए।
https://indianexpress.com/article/cities/mumbai/water-conservation-department-data-on-jalyukta-shivar-number-of-water-tankers-in-drought-hit-villages-decline-5213786/
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Friday, June 15, 2018
हीरे के सौन्दर्य की समीक्षा कोयला कर रहा है
सपा बसपा कांग्रेस और न्यूजचैनली मीडिया के "चटपटे फास्टफूड" सरीखे एंकरों एडीटरों एवं लाल बुझ्झकड़ी विश्लेषकों की फौज आजकल एक ही राग अलाप रही है कि मोदी सरकार ने 4 साल में और योगी सरकार सरकार ने एक साल में कोई काम ही नहीं किया।
आइए सच्चाई जानने का प्रयास करते हैं।
2012 में उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान में सपा ने किसानों का 50 हज़ार रुपये का कर्ज माफ करने का वायदा किया था। इसमें ना तो कोई शर्त जोड़ी थी, ना ही कोई शर्त बताई थी। लेकिन सरकार बनने के 8 माह बाद 23 नवम्बर 2014 को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कर्ज़ माफ़ी की घोषणा इस शर्त के साथ की थी कि यह कर्जमाफी व्यवसायिक बैंकों के कर्ज पर लागू नहीं होगी। अखिलेश सरकार की इस शर्त के बाद पूरे प्रदेश के किसानों का मात्र 1,650 करोड़ का कर्ज माफ किया गया था। यह कर्ज़ भी एक साथ माफ नहीं किया था। 1,650 करोड़ के कर्ज माफ करने के लिए सरकार ने पहले वर्ष के बजट में मात्र 500 करोड़ रूपयों का प्रावधान किया गया था। अखिलेश ने इस कर्ज़ माफ़ी से लगभग 7 लाख किसानों को लाभ पहुंचाने का दावा किया था।
लेकिन 19 मार्च 2017 में उत्तरप्रदेश में सरकार बनने के मात्र 15 दिन बाद 4 अप्रैल 2017 को योगी सरकार ने किसानों का 36,000 करोड़ का कर्ज माफ कर दिया था। इससे प्रदेश के लगभग 2 करोड़ किसानों को लाभ पहुंचा। पर हास्यास्पद विडम्बना देखिए कि वही अखिलेश यादव आज कह रहा है कि योगी सरकार ने कर्ज़माफी के नाम पर किसानों के साथ धोखा किया, किसानों के लिए कोई काम नहीं किया। इससे बड़ी विडम्बना यह कि अखिलेश यादव के इस आरोप पर न्यूजचैनली मीडिया आजकल बेसुध होकर झूम रहा है।
यह कुछ ऐसी स्थिति है जैसे कि हीरे के सौन्दर्य की समीक्षा कोयला कर रहा हो।
अखिलेश यादव सरकार द्वारा मात्र 1,650 करोड़ के कर्ज की सशर्त माफ़ी के समाचार का लिंक
https://www.bbc.com/hindi/india/2012/11/121122_farmer_loan_waiver_pa
योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा 36,000 करोड़ की कर्जमाफी के समाचार का लिंक
https://www.patrika.com/unnao-news/public-likes-bjp-kisan-karj-maaf-in-unnao-news-in-hindi-1545558/
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बहुत कुछ पाने के लिए बहुत कुछ छोड़ना भी पड़ता है।
बहुत कुछ पाने के लिए बहुत कुछ छोड़ना भी पड़ता है।
बात 70 के दशक के शुरुआती वर्षों की है। 1969 में सुपरहिट फिल्म आराधना की सफलता के साथ मनोरंजन की दुनिया में ध्रुव तारे की तरह चमके राजेश खन्ना के फिल्मी करियर में आराधना के साथ ही साथ दो रास्ते इत्तेफ़ाक़ डोली और खामोशी सरीखी सुपरहिट फिल्मों का नाम जुड़ चुका था।
उस समय तक एकमात्र एकछत्र सुपरस्टार राजेश खन्ना के विषय में यह मशहूर हो चुका था कि उनदिनों सफलता उनके सिर पर चढ़कर बोलती थी। उनका अहंकार अपने चरम पर हुआ करता था। उसी दौर में 1970 में राजेश खन्ना को पता चला कि निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी अपनी एक बहुत छोटे बजट की फ़िल्म को लेकर नायक की तलाश कर रहे हैं। लेखक गुलज़ार के माध्यम से राजेश खन्ना को फ़िल्म की कहानी पता चली थी। कहानी सुनने के बाद राजेश खन्ना ने ऋषिकेश मुखर्जी के ऑफिस पहुंचकर उनसे कहा था कि ऋषि दा यह फ़िल्म तो मैं ही करूंगा। यह सुनकर ऋषि दा ने राजेश खन्ना से कहा था कि मेरी फ़िल्म बहुत छोटे बजट की है इसलिए मेरी तीन शर्ते हैं। पहली शर्त यह कि तुमको केवल एक लाख रूपये दूंगा (उनदिनों राजेश खन्ना की फीस 8 लाख रूपये हुआ करती थी) दूसरी शर्त यह कि तुम्हें अपनी बहुत सारी डेट्स एक साथ देनी होंगी। तीसरी यह कि तुम्हें शूटिंग पर टाइम से पहुंचना होगा।
ऋषि दा की इन तीनों शर्तों के जवाब में राजेश खन्ना ने अपनी डायरी निकाल कर उनके सामने रखते हुए कहा था कि दादा जो और जितनी डेट्स चाहिए अपने हाथ से लिख दीजिये। मैं और लोगों को मैनेज कर लूंगा। एक लाख रूपये की मेरी फीस भी फाइनल और शूटिंग पर समय से भी पहुंचूंगा। दोनों के बीच डील फाइनल हुई और फ़िल्म बनना शुरू हुई।
वो ऐसी फ़िल्म बनी कि आज 47 साल बाद भी दुनिया भर की 47 लाख से अधिक फिल्मों के सबसे बड़े ऑन लाइन संग्रह #IMDB (Internet Movie Database,) की सर्वाधिक लोकप्रिय भारतीय फिल्मों की सूची में उस फिल्म का नाम पहले नम्बर पर है। उस फिल्म का नाम है #आनंद।
सम्भवतः समय बीतने के साथ राजेश खन्ना की अन्य सुपरहिट फिल्में धीरे धीरे अपनी चमक खोती गईं और उनकी चमक धीरे धीरे कम ही होती जाएगी। लेकिन 47 वर्ष बाद भी IMDB की लोकप्रियता सूची में पहले स्थान पर बनी हुई आनंद यह बताती है कि जबतक हिन्दी फिल्मों का दौर चलेगा तबतक आनंद और राजेश खन्ना भी जिंदा रहेंगे।
फ़िल्म आनंद लोकप्रियता का ऐसा इतिहास रच देगी यह तो राजेश खन्ना ने भी नहीं सोचा होगा लेकिन फ़िल्म की कहानी और ऋषि दा की काबिलियत पर तो उनको विश्वास था ही इसीलिए उस समय के उस परम लोकप्रिय, चरम अहंकारी सुपरस्टार ने भी आनंद फ़िल्म के लिए अपने प्रचण्ड अहं को भी पूरी तरह मार दिया था।
आज उपरोक्त प्रसंग का जिक्र इसलिए किया क्योंकि उपरोक्त प्रसंग यह सन्देश देता है कि यदि जीवन में कुछ विशेष विशिष्ट और विलक्षण प्राप्त करना है तो बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है, जैसे कि राजेश खन्ना सरीखे व्यक्ति ने आनंद के लिए छोड़ दिया था।
हर समय हमारे मन की ही हो यह सम्भव नहीं है।
अतः देश के प्रधानमंत्री को गली चौक चौराहों पर मदारी (हमारे मन) की रस्सी से बंधा वो बन्दर समझना बन्द करिये जो हर मोड़ हर चौराहे पर लोगों की मर्ज़ी के हिसाब से नाचता कूदता है।
ख़बरों की दुनिया की तंग पगडंडियों, संकरे अँधेरे रास्तों तथा चकाचौंध राजमार्गों से साक्षात्कार करती सक्रिय पत्रकारिता की लगभग ढाई दशक लम्बी यात्रा के पश्चात् अब स्वतन्त्र लेखन के पड़ाव पर हूं.
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Thursday, May 31, 2018
कैराना की हार के सच से मुंह चुरा रहे हैं राजनीति और मीडिया के मठाधीश।
ना कोई जाट मुस्लिम एकता हुई। ना कोई दलित लामबंदी हुई। ना ही कोई किसानों नौजवानो की नाराजगी थी। ऐसी एकता, लामबंदी और नाराज़गी का राग अलाप रहे राजनीति और मीडिया के प्रायोजित मठाधीश अपने ऐसे राग से हमारी आपकी आंखों में धूल झोंक रहे हैं।
कैराना उपचुनाव के परिणामों के मूल कारणों से मुंह चुरा रहे न्यूजचैनली/मीडियाई मठाधीश दरअसल यह स्वीकार करने का साहस नहीं कर पा रहे हैं कि कैराना में धुर साम्प्रदायिक आधार पर प्रचण्ड मुस्लिम ध्रुवीकरण हुआ। ध्यान रहे कि उत्तरप्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 16 सीटें ऐसी हैं जिनमें मुस्लिम मतदाता 20 से 50 प्रतिशत तक हैं। 35 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के आंकड़ें के साथ कैराना इन्हीं 16 लोकसभा सीटों की सूची में शामिल है।
#अब जरा इन तथ्यों और आंकड़ों को पूरा और ध्यान से पढ़िए...
कैराना लोकसभा सीट पर मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 16,90,000 मतदाता हैं। इसमें मुस्लिम मतदातों की संख्या लगभग 35%, अर्थात कैराना में लगभग 5 लाख 65 हज़ार मुस्लिम मतदाता हैं।
इस उपचुनाव में कैराना में लगभग 55% मतदान हुआ था। अर्थात लगभग 9 लाख 43 हज़ार मत पड़े थे।
यह जग जाहिर तथ्य है कि कैराना लोकसभा सीट पर मुस्लिम मतदाताओं का मतदान प्रतिशत सामान्य मतदान से अधिक प्रतिशत में हुआ था।
अतः बहुत कंजूसी से यदि यह मान लीजिए कि मुस्लिम मतदाताओं का मतदान कुल मतदान से केवल 5% अधिक हुआ तो कैराना में कुल मुस्लिम वोट लगभग 3,40,000 पड़ा। जबकि वास्तविकता संख्या इससे अधिक ही होगी। दिल्ली से लेकर देवबंद तक जारी हुए मोदी-योगी हराओ वाले फतवों और भाजपा बनाम सब की चुनावी स्थिति के बाद यह 3,40,000 मुस्लिम वोट भाजपा के पक्ष में गए होंगे, ऐसा मूर्खतापूर्ण निष्कर्ष राजनीतिक धरातल की कठोर और कटु सच्चाई से पूरी तरह अनभिज्ञ कोई राजनीतिक अनपढ़/गंवार ही निकाल सकता है। मेरा अपना मानना है कि इनमें से ज्यादा से ज्यादा 5 से 10 हज़ार मत ही भाजपा को मिले होंगे। सम्भव यह भी है कि वो भी नहीं मिले होंगे।
2014 में कैराना में 15,31,642 मतदाता थे। उस समय सपा बसपा और RLD-कांग्रेस गठबन्धन अलग अलग चुनाव लड़े थे। उनके तीनों प्रत्याशियों को कुल मिलाकर 5,32,201 मत मिले थे।
इसबार इन सारे दलों के गठबन्धन की संयुक्त प्रत्याशी तबस्सुम हसन को 481182 मत मिले हैं। इनमें अर्थात गठबन्धन प्रत्याशी को 2014 की तुलना में लगभग 51 हज़ार मत कम मिले हैं। यहां यह ध्यान रखिये कि 2014 में 73.08% मतदान हुआ था। जबकि इस उपचुनाव में 55% मतदान हुआ है। अर्थात 2014 की तुलना में लगभग 2 लाख मत कम पड़े हैं। यहां यह भी ध्यान रखिये कि 2014 में तीनों दलों के प्रत्याशी अलग अलग थे। उन तीनों दलों के प्रत्याशियों और उनकी कोर टीम के सदस्यों के व्यक्तिगत प्रभाव वाले मत भी 5,32,201 मतों में शामिल थे। राजनीति के रसायन को समझने वाले यह भलीभांति जानते हैं कि किसी भी दल के प्रत्याशी के व्यक्तिगत सम्बन्धों/सम्पर्कों वाले मतों का दलीय राजनीति से कोई लेनादेना नहीं होता।
उस समय तीनों दलों को मिले वोटों में कम से कम 5-6% वोट उन प्रत्याशियों का व्यक्तिगत वोट था।
अतः आंकड़ों की उपरोक्त सच्चाई यह तो बता ही रही है कि 2014 में गठबन्धन को जितने मत मिले थे उससे मात्र 20-25 हज़ार कम मत उसे इसबार कम मिले हैं। यानी कि मोदी विरोधी राजनीतिक ताकतों का प्रदर्शन जितना सम्भव हो सकता था उतना ही हुआ। इसके बावजूद भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह मात्र 44618 मतों से हारी हैं। उन्हें 4,36,564 मत मिले हैं। भाजपा को 2014 की तुलना में लगभग 1,30,000 मत कम मिले हैं, क्योंकि 2014 में भाजपा को 5,65,909 मत मिले थे। लेकिन यह 1,30,000 मत विपक्षी गठबन्धन के खाते में नहीं गए। इसके बजाय भाजपा का यह वोटर मतदान के लिए नहीं निकला। इसके कई कारण हैं। पहला तो यही है कि इस उपचुनाव का देश या प्रदेश की सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना था। उपचुनाव में भाजपा का मतदाता उदासीन रहता ही है।
अनुमान लगाइए कि 2019 में जिस समय 2019 मे देश का प्रधानमंत्री, सरकार चुनने के लिए जब वोट डाले जाएंगे तब मृगांका सिंह की 44 हज़ार मतों से हार का अन्तर किस तरह निष्प्रभावी होगा।
यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तरप्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 16 सीटें ऐसी हैं जिनमें मुस्लिम मतदाता 20 से 50 प्रतिशत तक हैं। 35 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के आंकड़ें के साथ कैराना इन्हीं 16 लोकसभा सीटों की सूची में शामिल है। अतः ऐसे कैराना लोकसभा क्षेत्र में गठबन्धन की पूरी ताकत झोंकने के बाद केवल 44 हज़ार मतों की हार एक सुखद सन्देश है कि फिलहाल प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की साख बरकरार है और 2019 की कसौटी के लिए पूरी तरह तैयार है।
उपरोक्त तर्कों के अलावा एक और कारण है कैराना की हार का। यदि वह कारण नहीं होता तो भाजपा यह उपचुनाव भी जीतती। पोस्ट लम्बी हो गयी है। इसलिए वह कारण कल लिखूंगा।
ख़बरों की दुनिया की तंग पगडंडियों, संकरे अँधेरे रास्तों तथा चकाचौंध राजमार्गों से साक्षात्कार करती सक्रिय पत्रकारिता की लगभग ढाई दशक लम्बी यात्रा के पश्चात् अब स्वतन्त्र लेखन के पड़ाव पर हूं.
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Saturday, May 26, 2018
देश को आज ऐसे विश्वासघाती प्रधानमंत्री और विश्वासघाती सरकार की ही जरूरत है।😊
21 जुलाई 2013 को सुप्रीमकोर्ट में केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार ने बाकायदा एक हलफनामा देकर देश में बने नेशनल हाईवे से सम्बंधित आंकड़े प्रस्तुत किये थे।
अपने हलफनामे में कांग्रेसी यूपीए की सरकार ने सुप्रीमकोर्ट को यह बताया था कि देश में 1980 तक कुल 29023 किमी लम्बाई के नेशनल हाइवे बन चुके थे। उसके बाद के 32 वर्षों में, 2012 तक देश में 47,795 किमी हाइवे बने थे।
अपने इस हलफनामे में तत्कालीन यूपीए की कांग्रेसी सरकार ने यह सच भी स्वीकार किया था कि 32 वर्षों बने इस 47,795 किमी लम्बे हाइवे में से 23815 किमी लम्बे हाइवे का निर्माण अटल जी के नेतृत्व वाली NDA सरकार के 5 वर्ष के कार्यकाल में हुआ था। (हलफनामे की खबर का लिंक पहले कमेन्ट में है)
इस हलफनामे में 2004 से 2014 तक के कांग्रेसी यूपीए शासनकाल के सम्बन्ध में भी यह कहा गया था कि इस दौरान लगभग 16000 किमी लम्बे हाइवे के निर्माण हुआ। (वर्ष 2013-14 का अनुमान लगाकर संख्या बताई थी)
अब जरा इस आंकड़ें पर ध्यान दीजिए कि 1980 से 2012 तक के 32 वर्ष की समयावधि में से 27 वर्षीय गैर भाजपाई शासनकाल में से 25 वर्ष तक कांग्रेस का शासनकाल रहा। इसमें 1980 से 1996 के बीच के 15 वर्ष में कांग्रेस का शासन था। इसमें से 10 वर्ष तक देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर राहुल गांधी की दादी इंदिरा गांधी और पिताश्री राजीव गांधी ही बैठे थे।
यदि यह मान लिया जाए कि वीपी सिंह चन्द्रशेखर देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल के नेतृत्व वाली सरकारों के 2 सालों के कार्यकाल में एक इंच नेशनल हाइवे नहीं बनाया गया तो भी उन 15 वर्षों के कांग्रेसी सरकार के कार्यकाल में देश में मात्र 8 हज़ार किलोमीटर लम्बे हाइवे बने थे।
अर्थात 1980 से 2014 के दौरान 25 वर्षों के कांग्रेसी शासन में कुल 24 हज़ार किलोमीटर लम्बे नेशनल हाइवे बने थे जबकि अटल जी की सरकार के केवल 5 वर्ष के कार्यकाल में 23815 किमी लम्बे हाइवे बने थे।
और आज ही प्रकाशित खबर के अनुसार मई 2014 से मार्च 2018 तक के अपने केवल 4 वर्षीय कार्यकाल में मोदी सरकार ने देश में 28702 किमी लम्बे नेशनल हाइवे बनाए हैं।
अतः आज देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार को विश्वासघाती बताकर देश में विश्वासघात दिवस मना रही कांग्रेसी नेताओं की फौज यह समझ ले कि देश को आज 25 वर्षों में 24 हज़ार किमी नेशनल हाईवे बनाने वाली कांग्रेसी सरकारों की जरूरत नहीं है।
इसके बजाय देश को केवल 4 वर्षों में 28हज़ार 702 किमी लम्बे नेशनल हाइवे बनाने वाली उस मोदी सरकार की जरूरत है।
कांग्रेस फौज अगर फिर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार को विश्वासघाती कहती है तो वह भलीभांति यह समझ ले कि देश को आज ऐसे विश्वासघाती प्रधानमंत्री और सरकार की ही जरूरत है। नेशनल हाइवे के निर्माण की कसौटी इसका पहला या अकेला कारण नहीं है। अगली पोस्टों में ऐसे 10 और कारण लिखने वाला हूं। कांग्रेसी फौज प्रतीक्षा करे...😊
सुप्रीमकोर्ट में यूपीए सरकार द्वारा दिये गए नेशनल हाइवे निर्माण से सम्बंधित हलफनामे की खबर का लिंक... https://m.timesofindia.com/india/NDA-regime-constructed-50-of-national-highways-laid-in-last-30-years-Centre/articleshow/20869113.cms
ख़बरों की दुनिया की तंग पगडंडियों, संकरे अँधेरे रास्तों तथा चकाचौंध राजमार्गों से साक्षात्कार करती सक्रिय पत्रकारिता की लगभग ढाई दशक लम्बी यात्रा के पश्चात् अब स्वतन्त्र लेखन के पड़ाव पर हूं.
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Saturday, April 7, 2018
मोदी विरोध का अपना ज़हर जनता में मत फैलाओ पुण्यप्रसून बाजपेयी
3 वर्ष पूर्व 8 अप्रैल 2015 से देश में लागू हुई थी मुद्रा योजना। गरीबों को स्वरोजगार के लिए 10 हज़ार से 10 लाख रूपये तक का कर्ज़ बिना किसी गारंटी के देने की यह योजना अपने उद्देश्य में कितनी सफल हुई कितनी असफ़ल हुई.? इसका लेखाजोखा लेकर ABP न्यूज पर कल 6 अप्रैल को पुण्यप्रसून बाजपेयी प्रकट हुआ था और उसने मुद्रा योजना को पूरी तरह असफल, अपने उद्देश्य में विफल तथा सरकारी धांधली और बैंक कर्मियों के भयंकर भ्रष्टाचार का उदाहरण बताया था।
अपने इस निष्कर्ष के पक्ष में उसने तीन तथ्य प्रस्तुत किये थे।
पहला तथ्य यह था कि मुद्रा योजना में अबतक जितने कर्ज़ बांटे गए हैं उनमें से 39 लाख 90 हज़ार कर्ज़ NPA बन चुके हैं, अर्थात बेंकों द्वारा कर्ज़ दी गयी यह राशि वापस नहीं आ रही।
दूसरा तथ्य यह था कि मुद्रा योजना में 92% कर्ज 50 हज़ार या उससे कम की राशि के बांटे गए हैं। उसका सवाल था कि 50 हज़ार या उससे कम राशि में क्या और कैसा स्वरोजगार कर सकता है।
तीसरे_तथ्य में बाजपेयी 5-6 ऐसे लोगों को लेकर अपने कार्यक्रम में प्रस्तुत हुआ था जिन्होंने मुद्रा योजना के लिए कर्ज मांगा था लेकिन उन्हें नहीं दिया गया।
सबसे पहले बात पहले तथ्य की। ध्यान रहे कि 8 अप्रैल 2015 को लागू हुई मुद्रा योजना में अबतक लगभग 11 करोड़ लोगों को लगभग 4.5 लाख करोड़ रूपये का कर्ज़ बांटा जा चुका है। कल रात अपनी हथेली रगड़ कर कूल्हे उछालते हुए पुण्यप्रसून बाजपेयी जब बैंकों को वापस नहीं मिल रहे कर्ज़ की संख्या 39 लाख 90 हज़ार बता रहा था तो ऐसा लग रहा था कि कोई बहुत बड़ी संख्या बता रहा है जबकि यह संख्या उन कर्ज़दारों की संख्या का केवल 3.62% है जिन्होंने मुद्रा योजना में कर्ज लिया है। बिना किसी गारंटी के कर्ज देने की किसी सरकारी योजना के लागू होने के 3 वर्ष बाद बैंकों का कर्ज यदि 96.3% कर्जदार नियमित रूप से चुका रहे हैं तो इसका बहुत सीधा सा अर्थ है कि योजना अपने उद्देश्य में बहुत सफल हुई है तथा बैंकों द्वारा बांटे गए कर्ज़ का सदुपयोग ही हो रहा है। उपरोक्त तथ्य यह भी बता रहा है कि मुद्रा योजना का ऋण देने में पात्रों के चयन में सावधानी बरती गयी है और पात्र व्यक्ति को ही कर्ज़ मिला है। यही कारण है कि 96.32% कर्ज़दार ईमानदारी से अपना कर्ज़ वापस कर रहे हैं।
अब बात दूसरे तथ्य की कि क्या 50 हज़ार या उससे कम की राशि से क्या कोई व्यक्ति कोई स्वरोजगार प्रारम्भ कर सकता है, क्या ऐसा सम्भव है.?
उपरोक्त प्रश्न के उत्तर में सिर्फ इतना ही कहना पर्याप्त समझता हूं कि नियमित रूप से कर्ज़ वापस कर रहे मुद्रा योजना के 96.32% कर्ज़दारों की संख्या ही यह बता रही है कि हां 50 हज़ार या उससे कम की राशि में भी स्वरोजगार प्रारम्भ किया जा सकता है और उसे सफलतापूर्वक प्रारम्भ चलाया भी जा सकता है। ABPन्यूज और उसका नया रंगरूटिया पुण्यप्रसून बाजपेयी सम्भवतः यह भूल गए हैं कि प्रधानमंत्री ने जिस दिन यह योजना लागू की थी उसी दिन यह स्पष्ट कर दिया था कि मूलतः यह योजना समाज के सबसे गरीब और पिछड़े वर्ग की रोजगार की समस्या के समाधान के लिए प्रारम्भ की जा रही है।
अन्त में बात तीसरे तथ्य की। एकबार फिर उन्हीं 96.32% कर्ज़दारों की संख्या के उदाहरण देकर ही अपना जवाब देना चाहूंगा कि जो स्वयं द्वारा दिया गया अपना कर्ज़ बैंकों को ईमानदारी से वापस कर रहे हैं। उपरोक्त संख्या इसबात का साक्ष्य है कि मुद्रा योजना के कर्ज़दारों के चयन में निश्चित रूप से सतर्कता बरती गई है। अन्यथा जिस देश में ट्रेन के शौचालयों में टीन का मग्घा तक जंजीर से बांध कर रखा जाता हो और एयरकंडीशंड चेयर कार में सफर करनेवाले तथाकथित धनाढ्य अभिजात्य वर्ग के चोर सीटों पर लगे इयरफोन उखाड़कर अपने साथ ले जाते हों उस देश में बिना गारंटी के मिल रहे हज़ारों रूपयों के कर्ज यदि आंख बंद कर के बांट दिए गए होते तो उनका क्या हश्र होता.? यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
इसीलिए रात में मुद्रा योजना के खिलाफ ज़हर उगलती पुण्यप्रसून बाजपेयी की रिपोर्ट ABP न्यूज पर देखने के बाद मैंने लिखा था कि मोदी विरोध की मंडी बन चुके ABP न्यूज पर पुण्यप्रसून बाजपेयी जिन आंकड़ों की दुकान सज़ा कर जनता को ज़हर बेचने का पत्रकारीय कुकर्म कर रहा था वही आंकड़े मुद्रा योजना की जबरदस्त सफलता की कहानी सुना रहा हैं।
ध्यान रखिये कि मैंने अपनी बात उसी पुण्यप्रसून बाजपेयी द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों को ही आधार बनाकर कही है, अपनी तरफ से कोई नया आंकड़ा नहीं दिया है।
ख़बरों की दुनिया की तंग पगडंडियों, संकरे अँधेरे रास्तों तथा चकाचौंध राजमार्गों से साक्षात्कार करती सक्रिय पत्रकारिता की लगभग ढाई दशक लम्बी यात्रा के पश्चात् अब स्वतन्त्र लेखन के पड़ाव पर हूं.
राष्ट्रवादी दृष्टिकोण वाली मेरी लेखनी का एकमात्र उद्देश्य "जनहित की बात, राष्ट्रहित के साथ" करना है.