Tuesday, February 27, 2018

बाबा तुम बौराओ मत। PART_1

सबसे पहले बात बाबा को लेकर छिड़े विवाद की... बाबा के सीरियल और ब्राह्मणों को कोसने गरियाने की, तो बाबा के पक्ष और विपक्ष में सोशल मीडिया में उछल कूद रहे दोनों पक्ष यह भलीभांति समझ लें कि दोनों ही झूठ बोल रहे हैं।
पहले बात बाबा पक्ष की। चूंकि ब्राह्मण कुल में जन्मा हूं इसलिए ब्राह्मणों में व्याप्त जातीय दुराग्रहों पूर्वाग्रहों को भी बहुत करीब से देखा और अनुभव किया है। इसलिए दावे के साथ कह सकता हूं कि भारत के किसी भूभाग में कहीं किसी क्षेत्र में यादव जाति के सामाजिक बहिष्कार तिरस्कार की, उनको अस्पृश्य मानने की कोई परम्परा कभी कहीं नहीं रही। क्योंकि इसके विपरीत उनको भगवान श्रीकृष्ण के वंशजों के तौर पर ही चिन्हित किया जाता रहा है।
बाबा के विपक्ष में आगबबूला हो रहा पक्ष भी यह सत्य स्वीकार कर ले कि यादवों के प्रति अस्पृश्यता के भाव की परम्परा भले ही कभी नहीं रही हो किन्तु एक बहुत बड़े वर्ग के प्रति यह भाव सदियों तक रहा है। हालांकि आज यह स्थिति बहुत बदल चुकी है। लेकिन फिर भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। अतः किसी सीरियल में ऐसे किसी प्रसंग को दिखाए जाने पर आगबबूला मत होइए। सच कड़वा होता है, इसलिए निगलना सीखिए।

मेरे अनुसार सोशलमीडिया में आजकल गर्म उपरोक्त जातीय विवाद का जिम्मेदार केवल और केवल बाबा ही है, क्योंकि जो टीवी सीरियल इस विवाद के केंद्र में है उसे बाबा की अधिकृत जीवनी कहा जा रहा है। बाबा ने इसपर अपनी सहमति दी है। अतः यदि किसी गुमनाम मन्दिर के किसी गुमनाम ब्राह्मण का जातीय दुर्व्यवहार बाबा को आज भी याद है तो बाबा को यह भी याद रखना चाहिए कि राजीव दीक्षित नाम का ही एक ब्राह्मण और भी था जिसने योग की दुनिया से बाहर राजनीतिक सामाजिक आर्थिक विषयों में बाबा को दीक्षित किया था। बाबा को सार्वजनिक रूप से इन विषयों पर मंच प्रदान किया था।
राजीव दीक्षित की मृत्यु हुए लगभग 8 वर्ष हो चुके लेकिन इन 8 वर्षों में बाबा एक भी ऐसा नया राजनीतिक सामाजिक आर्थिक सिद्धांत/मुद्दा/जानकारी देश को नहीं दे सके हैं जिसका जिक्र 8 वर्ष पूर्व राजीव दीक्षित ने बहुत विस्तार से नहीं किया हो। इन मुद्दों पर बाबा का कोई भी भाषण प्रवचन उपदेश सुन लीजिए और फिर यूट्यूब पर ढूंढ लीजिये। उस विषय/मुद्दे पर वही सब बातें ज्यादा विस्तार से बोलते कहते हुए राजीव दीक्षित आपको दिख जाएंगे, जो बाबा आज और अब कहते हैं।
अब बात बाबा के बौराने की...
सबसे पहले याद दिला दूं कि कुछ समय पूर्व रामदेव ने जब दावा किया था कि "यदि मैं चाहता तो 2014 में खुद प्रधानमंत्री बन सकता था।", तब मुझे एक बैलगाड़ी के आगे चल रही बिल्ली को हुई गलतफहमी की कहानी बहुत याद आयी थी। क्योंकि रामलीला मैदान से वृहन्नला वेश में पलायन की अपनी कीर्ति कथा से लदे फंदे रामदेव ने 2012 के विधानसभा चुनाव में लखनऊ में 7-8 हज़ार की क्षमता वाले जिस मैदान में प्रचार सभा की थी वो आधा भी नहीं भरा था। तथा जिन 2 BJP प्रत्याशियों के प्रचार के लिए रामदेव ने वो सभा की थी वो दोनों बुरी तरह हारे थे। और जिस कांग्रेस के खिलाफ बाबा ने जमकर आग उगली थी उस कांग्रेस की प्रत्याशी 36 हज़ार वोटों से जीती थी। अतः 2014 का किंग मेकर होने का नशा रामदेव के सिर से जितनी जल्दी उतर जाए उतना बेहतर होगा।
क्योंकि 2014 का चुनाव अभियान शंकर जी की बरात की तरह थी। जिसमें दूल्हा किसी बराती के भरोसे नहीं था बल्कि इसके बजाय सारे बराती ही दूल्हे के भरोसे थे। रामदेव को कड़ुआ बहुत लगेगा लेकिन सच तो यह भी है कि 2012 तक पतंजलि की बिक्री का जो आंकड़ा 4-5 सौ करोड़ के बीच झूलता था वो आज अगर उछलकर 10 हज़ार करोड़ तक पहुंचा है तो इसका सबसे बड़ा कारण 2014 में शंकर जी की बरात सरीखे उस चुनावी अभियान में रामदेव का शामिल होना भी था।
अब बात बाबा द्वारा योग का परचम बुलन्द करने की...
नई पीढ़ी को शायद ज्ञात नहीं हो कि...
जिस समय रामदेव को कोई जानता नहीं था उसके वर्षों पहले ही ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी ने योग गुरू बीकेएस अय्यंगर को ही योग का प्रतीक मानते हुए अय्यंगर शब्द को ग्रहण कर लिया था और उसके मायने को "योग" लिखा था। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने उनको यह सम्मान यूं ही नहीं दे दिया था। इसके बजाय सम्पूर्ण विश्व मे योग का प्रचार प्रसार कर के योग गुरू बीकेएस अय्यंगर ने दुनिया को योग की महत्ता का ऐसा पाठ पढ़ाया था कि सम्भवतः जब रामदेव का जन्म भी नहीं हुआ उससे काफी पहले बीसवीं सदी के दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञों में से एक के रूप में प्रसिद्ध विश्व विख्यात वायलिन वादक येहुदी मेनुहिन 1952 में योग गुरू बीकेएस अय्यंगर के शिष्य बन चुके थे। ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ और बेल्जियम की महारानी समेत जयप्रकाश नारायण और जे कृष्णमूर्ति सरीखे लोग उनके शिष्य बने थे। बाबा को आईना देखना अच्छा लगे ना लगे लेकिन दिखाना जरूरी है। 50-60 साल पहले की उन विश्वविख्यात हस्तियों से लेकर आज के सचिन तेंदुलकर ने भी योग सीखने के लिए बाबा की नहीं बल्कि अय्यंगर जी की ही शरण ली थी। अय्यंगर जी का निधन 2014 में हुआ था। अय्यंगर जी की शिष्य बनी विश्व विख्यात अंतरराष्ट्रीय हस्तियों की सूची बहुत बड़ी है। रामदेव के जन्म के लगभग साल भर बाद बीकेएस अय्यंगर ने योग पर 1966 में अपनी पहली किताब "लाइट ऑफ योग" लिखी थी। जिसका दुनिया की 17 भाषाओं में अनुवाद हुआ। और पहले साल ही 1966 में वह दुनिया की बेस्ट सेलर किताबों की सूची में स्थान पा गई थी। 1966 से 2005 तक उस सूची में उसका वह स्थान बरकरार रहा था। बाबा को इस सवाल का जवाब जरूर देना चाहिए कि योग विद्या के प्रचार प्रसार में अद्वितीय अविस्मरणीय योगदान करनेवाले योग गुरू बीकेएस अय्यंगर को सम्मान देना तो दूर उनका जिक्र तक रामदेव ने कभी क्यों नहीं किया.? क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि योग गुरू बीकेएस अय्यंगर ब्राह्मण थे। क्या रामदेव स्वयं जातिवादी पूर्वाग्रह के विष से संक्रमित नहीं है.?
अगले भाग में बाबा के बाजारवाद पर बलिदान होते राष्ट्रवाद का पोस्टमार्टम।
21/2

Tuesday, February 20, 2018

घोटालेबाज लुटेरों के साथ मिलीभगत इसको कहते हैं

जनवरी 2009 में कम्प्यूटर कम्पनी सत्यम के मालिक रामलिंगम राजू का वह घोटाला सामने आया था जिसमें दस्तावेज़ी हेराफेरी कर के उसने बैंकों के 8000 करोड़ रू लूट लिए थे। (http://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=80778)
लेकिन उसकी सम्पत्ति जब्त करने की कार्रवाई शुरू हुई थी अक्टूबर 2012 में। (https://www.amarujala.com/news-archives/business-archives/ed-attaches-rs-822-crore-worth-assets-of-satyam-raju )
अर्थात रामलिंगम राजू का घोटाला पकड़े जाने के 3 वर्ष 10 महीने बाद उसकी सम्पत्ति जब्त करने की कार्रवाई प्रारम्भ हुई थी। अपने खिलाफ कार्रवाई में हुई इस तीन वर्ष 10 महीने की देर का भरपूर लाभ रामलिंगम राजू ने इसतरह उठाया कि जब 2012 में उसकी सम्पत्ति को जब्त करने की कार्रवाई की गई तबतक वो अधिकांश सम्पत्ति सुरक्षित ठिकाने लगा चुका था और एजेंसियों के हाथ उसकी केवल 822 करोड़ की सम्पत्ति हाथ लगी थी। घोटाला पकड़े जाने के तत्काल बाद के बजाय रामलिंगम राजू की सम्पत्ति को जब्त करने की कार्रवाई तीन वर्ष 10 महीने बाद क्यों की गयी.? कांग्रेस ने इसका जवाब देश को आजतक नहीं दिया।
यही नहीं घोटाले के 6 साल बाद अप्रैल 2015 में जब रामलिंगम राजू को 7 वर्ष की कैद और 5 करोड़ जुर्माने की सज़ा हुई तब तक वो 32 महीनों की सज़ा काट चुका था।
अर्थात घोटाले के पकड़े जाने के बाद के 75 महीनों में से 43 महीने तक, यानी लगभग साढ़े तीन वर्षों तक वो जेल से बाहर ही रहा था। इसतरह रामलिंगम राजू ने बैंकों के 8000 करोड़ रू लूटकर केवल 827 करोड़ रू देकर 7 वर्ष जेल में गुजारकर 7173 करोड़ रू हजम कर लिए थे।

अब याद दिला दूं कि 9000 बैंक घोटाले का अपराधी विजय माल्या मार्च 2016 में भारत से भागा और अक्टूबर 2016 में उसकी 8044 करोड़ की सम्पत्ति जब्त कर ली गयी।
नीरव मोदी का 11000 करोड़ का घोटाला 14 फरवरी को
उजागर हुआ और 16 फरवरी तक उसकी 5600 करोड़ की सम्पत्ति जब्त कर ली गयी। जब्ती की कार्रवाई अभी भी जारी है।
अतः घोटालेबाज लुटेरों के साथ सरकार की मिलीभगत कैसे और क्या होती है.? इसका जवाब उस घोटालेबाज लुटेरों के खिलाफ सरकार की कार्रवाई देती है।
ऊपर दो उदाहरण आपके सामने हैं। अब फैसला आप करिये कि किस सरकार की किस घोटालेबाज लुटेरे के साथ कैसी सेटिंग थी....

Sunday, January 21, 2018

जय बोलो बेईमान की, जय बोलो...!!!

वित्तीय वर्ष 2013-14 यानि कि यूपीए के दस वर्ष के कार्यकाल की समाप्ति के समय (31मार्च 2014) तक देश में EPFO (कर्मचारी भविष्य निधि संगठन) में दर्ज कर्मचारियों की संख्या 11 करोड़ 78 लाख थी।
दिसम्बर 2017 में सरकार द्वारा लोकसभा के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार...
31 मार्च 2015 तक यह संख्या 15 करोड़ 84 लाख,
31 मार्च 2016 तक यह संख्या 17 करोड़ 14 लाख,
31 मार्च 2017 तक यह संख्या 19 करोड़ 33 लाख तक पहुंच चुकी थी।
अर्थात मोदी सरकार के पहले 3 वर्षों के कार्यकाल में EPFO (कर्मचारी भविष्य निधि संगठन) में दर्ज हुए कर्मचारियों की संख्या में 7 करोड़ 55 लाख की वृद्धि हुई है। ध्यान यह भी रहे कि मोदी सरकार आने के पश्चात EPF खाते को आधार कार्ड से लिंक करने की अनिवार्यता इन आंकड़ों की प्रमाणिकता को सन्देह से परे कर चुकी है।
इसके बावजूद यदि उपरोक्त संख्या के आधे को ही सच मान लिया जाए तो भी इन तीन वर्षों में प्रतिवर्ष औसतन एक करोड़ 25 लाख नई नौकरियां लोगों को मिलीं हैं।
क्या यह आंकड़ा राहुल गांधी और कांग्रेसी फौज तथा सपा बसपा आरजेडी सरीखे उसके पिछलग्गू दलों के इस आरोप कि "मोदी सरकार के शासन में बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ी है।" की धज्जियां नहीं उड़ा रहा।
लेकिन इसके बावजूद मोदी विरोधी यह टोली आज भी अपने उपरोक्त आरोप की तोता-रटंत में व्यस्त है।
यह देख सुनकर मोदी विरोधी इस टोली के लिए 1972 में रिलीज हुई मनोजकुमार की सुपरहिट फिल्म के सुपरहिट गीत की यह शुरुआती पंक्तियां सर्वाधिक उपयुक्त सिद्ध होती है...
ना इज़्ज़त की चिंता ना फिकर कोई अपमान की,
जय बोलो बेईमान की, जय बोलो.....!!!

लोकसभा में सरकार द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज की खबर/आंकड़ें इस रिपोर्ट के अंत में देखकर पुष्टि कीजिये
http://www.mydigitalfc.com/plan-and-policy/demo-gst-impact-number-new-epfo-subscribers-drops-sharply

Saturday, January 20, 2018

जबड़े मसूढ़े जुबान लहूलुहान पर खुश है पाकिस्तान

यह सर्वज्ञात तथ्य है कि कुत्ता जब सूखी हड्डी को चबाता, चूसता है तो उसके मसूढे, उसकी जीभ, उसका तालू सूखी हड्डी की चोट से टूट जाता है जगह जगह, उससे खून बहने लगता है।  खून का स्वाद क्योंकि कुत्ते को बहुत पसंद होता है अतः वह उसी खून को चूसता चाटता है और सोचता रहता है कि खून हड्डी से आ रहा है।
आज उपरोक्त तथ्य का उल्लेख इसलिए क्योंकि आजकल पाकिस्तान कुछ इसी मनोदशा से गुजर रहा है। वह भारत को हड्डी समझकर चबाने चूसने की कोशिश में अपने जबड़े मसूढ़े जुबान लहूलुहान कर रहा है।
आज पाकिस्तान ने सीमा पर बसे नागरिक क्षेत्रों में भी धुआंधार गोलीबारी की है। इसमें दो भारतीय नागरिक शहीद हुए हैं। पिछले 10 दिनों से सीमा से लगातार ऐसे समाचार आ रहे हैं कि पाकिस्तानी फायरिंग में कभी 2 तो कभी 4 भारतीय सैनिक/नागरिक शहीद हो रहे हैं। इस समाचार के साथ ही यह समाचार भी आता है कि भारत की जवाबी फायरिंग में पाकिस्तान के कभी 4 कभी 8 कभी 12 पाकिस्तानी जवानों को ढेर किया। यानि भारत दोगुने, तीन गुने ज्यादा पाकिस्तानी जवान मार रहा है। लेकिन पाकिस्तान फिर भी मान नहीं रहा है। यह सिलसिला पिछले 10-12 से लगभग रोजाना चल रहा है। आखिर क्यों.?
इसका कारण है भारतीय गणतंत्र दिवस समारोह में बनने जा रहे एक इतिहास को बनने से रोकने की पाकिस्तान की मंशा।
दरअसल प्रधानमंत्री ने एक ही लीक पर चल रही 70 वर्ष पुरानी परम्परा को तोड़ते हुए इस वर्ष भारतीय गणतंत्र दिवस समारोह में किसी एक देश के राष्ट्राध्यक्ष को मुख्य अतिथि बनाने के बजाय 10 देशों के शक्तिशाली आर्थिक समूह आसियान ASEAN (एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस) के सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है। सभी राष्ट्राध्यक्षों ने समारोह में आने की सहमति भी दे दी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह रणनीतिक मास्टर स्ट्रोक है।
उल्लेखनीय है कि आसियान के सदस्य 10 देशों में से आधे से अधिक वो देश हैं जो चीन के कट्टर शत्रु हैं। अपना आर्थिक साम्राज्य स्थापित करने की चीन की चेष्टा के विरुद्ध चट्टान की तरह बाधा बनकर खड़े हैं। पिछले कुछ समय के घटनाक्रमों से इन देशों को अपनी चीन विरोधी रणनीति में भारत अपना सशक्त सहयोगी साझीदार स्पष्ट दिख रहा है। अतः भारत की राजधानी में इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों के जमावड़े से चीन के खिलाफ रणनीति को और शक्ति मिलेगी। यही कारण है कि चीन सर्वाधिक बौखलाया हुआ है। लेकिन वह स्वयं कुछ कह नहीं सकता, कुछ कर नहीं सकता। अतः उसने अपने पाले हुए कुत्ते पाकिस्तान को इस जमावड़े को रोकने के काम पर लगाया है। यही कारण है कि पाकिस्तान सीमा पर तनाव को इतना बढ़ा देने की कोशिश कर रहा है कि आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्षों की भारत यात्रा रद्द हो जाए। इससे भारत की किरकिरी होगी।
इसके लिए पाकिस्तान अपने दोगुने सैनिक भी मरवाकर अपनी कोशिशों में जुटा हुआ है। जबकि भारत अभी भी संयमित जवाब ही दे रहा है। लेकिन यदि पाकिस्तान की कोशिशें जारी रही तो 26-27 तक तो भारत उसको नापतौल के दोगुने तिगुने के हिसाब से जवाब देता रहेगा। लेकिन उपरोक्त तारीखों के बाद सीमा पर सम्भवतः ऐसी आतिशबाजी देखने को मिलेगी जो पाकिस्तान 1999 (कारगिल यद्ध) के बाद एक बार पुनः देखेगा सुनेगा।

Friday, January 12, 2018

संगीन सवालों के कठघरे में खुद खड़े हो गए हैं चारों जज

सुप्रीमकोर्ट के 4 जजों की अन्तरात्मा आज अचानक जाग गयी। जागी भी कुछ इसतरह कि मानो, दिसम्बर की कड़कड़ाती ठण्ड वाली रात को नींद की गोली खाकर बेसुध सोए व्यक्ति पर आधीरात को बर्फ वाले पानी की भरी हुई बाल्टी उड़ेलकर उसे जगा दिया गया हो। और वो हड़बड़ा कर चीखता हुआ उठ बैठा हो।
जजों की अन्तरात्मा के इस जगने जगाने का मामला माजरा क्या है.? यह धीरे धीरे उजागर हो ही जाएगा। लेकिन भारत के ज्ञात इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि सुप्रीमकोर्ट के 4 जजों ने सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर डाली।
लेकिन मेरे लिए यह घटनाक्रम आश्चर्यचकित करनेवाला नहीं है। बल्कि इस घटनाक्रम ने एक भारतीय के रूप में मुझे आहत अपमानित और लज्जित किया है।

आज अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में चारों जजों ने चीफ जस्टिस के खिलाफ शिकायतों का जो पुलिन्दा प्रेस के सामने प्रस्तुत किया उसमें एकमात्र सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण शिकायत यह ही थी कि केसों का बंटवारा ठीक से नहीं किया जा रहा।
बड़े और महत्वपूर्ण केस के बंटवारों में भेदभाव हो रहा है।
यह सुनते ही मन खिन्न हो गया। ग्लानि खीझ क्षोभ और कुंठा से भर उठा। क्योंकि अभी तक राजनीति में भ्रष्ट और स्वार्थी नेताओं को इसबात पर लड़ते रूठते हुए तो देखा था कि मुझे महत्वपूर्ण विभाग का मंत्री नहीं बनाया गया। यह हम सब जानते हैं कि महत्वपूर्ण से उस नेता का इशारा आम जनता की भाषा में "मलाईदार मंत्रालय" की तरफ होता है। मलाईदार मंत्रालय का क्या अर्थ होता है.? यह सच किसी व्यक्ति से छुपा हुआ नहीं है, इसके मायने सब जानते हैं।
लेकिन सुप्रीमकोर्ट के जजों की ही दृष्टि में सुप्रीमकोर्ट में पहुंचा कोई केस महत्वहीन या महत्वपूर्ण कैसे और क्यों हो जाता है। अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि आज अचानक जागी अपनी अन्तरात्मा के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले 4 जजों का महत्वपूर्ण केसों से क्या तात्पर्य है.?
मेरा उपरोक्त संकेत का मर्म मेरे इस एक सवाल से स्पष्ट हो जाएगा।
मेरा सवाल:
इन 4 जजों की अन्तरात्मा तब क्यों नहीं जागी जब 9 अगस्त 2016 को अरुणांचल प्रदेश के मुख्यमंत्री कलिखो पुल ने सुप्रीमकोर्ट में लम्बित अपने केस के लिए हो रही 80 करोड़ रुपये की सौदेबाजी के कारण आत्महत्या करने की बात अपने 60 पेज लम्बे सुसाइड नोट में लिखी थी।
यह एक सवाल जजों की अन्तरात्मा और आज उनके द्वारा उठाये गए तथाकथित महत्वपूर्ण_केसों के बंटवारे की व्याख्या कर देता है।

आज प्रेस कॉन्फ्रेंस करनेवाले 4 जजों ने देश के चीफ जस्टिस समेत देश के सर्वोच्च न्यायालय के चरित्र और चेहरे को सन्देह और शंकाओं के घेरे में खड़ा कर दिया है। उनकी इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से कौन मजबूत हुआ कौन नहीं.? यह तो भविष्य बताएगा। लेकिन आज हुई इन 4 जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने देश मे सक्रिय आतंकवादियों के हमदर्द/समर्थक उस समूह को संजीवनी देने का कार्य अवश्य किया है जो अफ़ज़ल गुरु से लेकर याकूब मेमन तक, आतंकवादियों को सर्वोच्च न्यायलय द्वारा सुनाई गई सजाओं। तथा आतंकी इशरत जहां, सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर से लेकर बाटला हॉउस एनकाउंटर पर उंगली उठाता रहा है। उन निर्णयों को कठघरे में खड़ा करता रहा है। उस समूह के प्रशांत भूषण और इंदिरा जयसिंग सरीखे सदस्य आज हुई 4 जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस के खत्म होने के तत्काल बाद से उसके समर्थन में खुलकर बोल रहे हैं। उन चारों जजों की जमकर प्रशंसा कर रहे हैं। 4 जजों की आज हुई इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के भयानक परिणाम भविष्य में भोगेगा।
मेरी उपरोक्त आशंका निराधार नहीं है। क्योंकि आज अचानक जागी उन 4 जजों की तथाकथित अन्तरात्मा से सम्बंधित इन संगीन सवालों ने चारों जजों और उनकी अन्तरात्मा को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

Tuesday, January 9, 2018

एक महत्वपूर्ण जानकारी


1973 से 1985 तक इंदिरा गांधी के शासनकाल के दौरान प्रेम नाथ बहल नाम का एक IAS अधिकारी प्रधानमंत्री सचिवालय में ज्वाइंट सेक्रेटरी के रूप में कार्यरत था। पीएन बहल नाम का यह अधिकारी अक्टूबर 1984 में हुई इंदिरा गांधी की हत्या तक राजनीतिक मामलों में इंदिरा गांधी के निजी सलाहकार की ड्यूटी निभाता था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कुछ महीनों तक राजीव गांधी के साथ भी वो यही ड्यूटी निभाता रहा था। जनवरी 1985 में राजीव गांधी ने संसद में एक सनसनीखेज खुलासा किया था कि प्रधानमंत्री कार्यालय में जासूसों के एक गिरोह को चिन्हित किया गया है। इस गिरोह में ज्वाइंट सेक्रेटरी रैंक के कई IAS अधिकारी शामिल हैं। आईबी इस सन्दर्भ में आगे की जांच कर रही है। राजीव गांधी ने तब संसद से अनुरोध किया था कि इस सन्दर्भ में अभी ज्यादा कुछ बताने का दबाव मुझ पर मत डालिये क्योंकि इससे जांच प्रभावित हो जाएगी। अपने इस खुलासे के कुछ दिनों बाद राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री कार्यालय के कई अधिकारियों को हटा दिया था। हटाये गए अधिकारियों में पीएन बहल भी शामिल था।
राजीव गांधी के उस सनसनीखेज खुलासे और प्रधानमंत्री कार्यालय से अधिकारियों के हटाये जाने की कार्रवाई के मध्य कोई सम्बन्ध था या नहीं.? यह कभी स्पष्ट नहीं हो सका। लेकिन राजीव गांधी के जीवनकाल तक पीएन बहल को फिर कभी किसी जिम्मेदार पद पर नहीं नियुक्त किया गया। किन्तु राजीव गांधी की मृत्यु के पश्चात 1991 में कांग्रेस की सत्ता में हुई वापसी के साथ ही पीएन बहल पुनः महत्वपूर्ण हो गया था और आश्चर्यजनक रूप से गांधी परिवार का भी करीबी हो गया था।
इसके बाद ही अगले 5-6 वर्षों में उसके लड़के के मीडिया हाउस TV18 ने दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करना प्रारम्भ किया था।
इस पीएन बहल का लड़का है राघव बहल। यह वही राघव बहल है जिसने अपनी वेबसाइट पर तीन दिन पहले ही यह रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें यह दावा किया गया है कि कुलभूषण जाधव पाकिस्तान में रॉ के लिए काम करता था।
ज्ञात रहे कि भारत इस पाकिस्तानी आरोप को झुठलाता रहा है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में स्वयं पाकिस्तान भी ऐसा एक भी सबूत प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे उसके आरोप की पुष्टि हो। किन्तु राघव बहल की वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार कुलभूषण जाधव को लेकर पाकिस्तान सच बोल रहा है, भारत झूठ बोल रहा है। इसकी वेबसाइट की उस रिपोर्ट को पाकिस्तान पिछले 3 दिनों से अंतरराष्ट्रीय मंचों और मीडिया में एक सबूत के रूप में प्रस्तुत कर के स्वयं को सच्चा और भारत को झूठा, कुलभूषण जाधव को आतंकवादी तथा उसको सुनाई गई फांसी की सज़ा को न्यायोचित सिद्ध करने में जुटा हुआ है।
इससे पहले बीते वर्ष मार्च 2017 में इसी राघव बहल की वेबसाइट में प्रकाशित एक खबर के कारण सेना के जवान रॉय मैथ्यू ने आत्महत्या कर ली थी। उस सम्बन्ध में केस भी दर्ज है।
और थोड़ी जानकारी यह भी क़ि ये वही राघव बहल है जो कुछ वर्षों पूर्व तक TV18 मीडिया हाउस का मालिक हुआ करता था। इसने अपने न्यूजचैनल IBN7 द्वारा किये गए 2008 के वोट फ़ॉर कैश के स्टिंग ऑपरेशन को नहीं दिखाया था।
राघव बहल ने अपनी वेबसाइट पर भारत को झूठा, पाकिस्तान को सच्चा तथा कुलभूषण को आतंकवादी सिद्ध करने की खबर क्यों प्रकाशित की.? यह आसानी से समझा जा सकता है।
07/01/2017

कवि और तुकबंदियों के गवइय्ये में बहुत फर्क होता है

स्वतंत्रता पूर्व गांधी ने महाकवि महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला से भेंट के लिए उन्हें वर्धा स्थित अपने आश्रम में आमंत्रित किया था। निर्धारित तिथि व समय पर महाप्राण निराला वर्धा पहुंच गए थे। गांधी उस समय अपने कक्ष में नहीं थे। थोड़ी देर प्रतीक्षा के पश्चात निराला वहां से उठकर चल दिए थे। कक्ष से बाहर निकलकर निराला आश्रम के द्वार की तरफ बढ़े ही थे तब ही पीछे से तेजी से चलकर आये गांधी ने उन्हें रोका और कहा कि रुको निराला मैं आ गया हूं। गांधी की इसबात पर ठहर गए निराला ने पलटकर गांधी को जवाब दिया था कि... "यदि तुमको यह अभिमान है कि तुम युग प्रवर्तक नेता हो तो मुझे भी यह अभिमान है कि मैं युग प्रवर्तक कवि हूं। तुमने मुझे जिस समय पर बुलाया था उस समय पर मैं आया, लेकिन तुम नहीं मिले। अब अगर निराला से मिलना हो तो दारागंज इलाहाबाद आना।" इतना कहकर निराला वहां से चले आये थे। लेकिन यहां प्रशंसा गांधी की भी करनी होगी कि गांधी ने अपनी गलती को स्वीकारा था और अपनी एक इलाहाबाद यात्रा के दौरान इलाहाबाद के दारागंज स्थित निराला के निवास पर जाकर उनसे भेंट की थी।
हालांकि गांधी के नेहरू सरीखे चेलों ने निराला को उनके इन तेवरों के लिए दण्डित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। स्वतंत्रता के 14 वर्ष पश्चात 1961 में महाकवि निराला का देहांत हुआ था। उन 14 वर्षों के दौरान हिन्दी के अनेकानेक कवियों साहित्यकारों पर सरकारी सहायता सम्मानों और पदों की बरसात की गयी। किन्तु निराला को कभी कोई सम्मान या सहायता नहीं दी गयी। निराला ने गम्भीर आर्थिक स्थिति में ही इस दुनिया को अलविदा कहा था। लेकिन उन 14 वर्षों के दौरान भी निराला के तेवरों में किंचित मात्र भी परिवर्तन नहीं हुआ था। उनके स्वाभिमानी तेवर अंतिम क्षणों तक ज्यों के त्यों रहे थे।
आजकल कुमार विश्वास जिन रामधारी सिंह "दिनकर" का जिक्र अपने हर बयान, हर साक्षात्कार में कर के अपनी तुलना उनसे करने की शातिर कोशिश कर रहा है उन रामधारी सिंह दिनकर के कृतित्व के पैरों की धूल भी नहीं हैं कुमार विश्वास की सस्ती सतही रोमांटिक तुकबन्दियां। लेकिन उन रामधारी सिंह दिनकर को दी गयी राज्यसभा की कुर्सी और अन्य सरकारी सम्मानों व पदों पर तीखा प्रहार दिनकर जी के समकालीन उनके करीबी कवि मित्र गोपाल सिंह नेपाली ने तब किया था जब नेपाली जी के विद्रोही तेवरों को थोड़ा शांत करने की सलाह दिनकर जी ने उनको दी थी।
उस सलाह का जवाब नेपाली जी ने बाकायदा उस कवि सम्मेलन के मंच से सार्वजनिक रूप से दिया था जिस कवि सम्मेलन में दिनकर जी स्वयं उपस्थित थे। तब गोपाल सिंह नेपाली जी ने उनको संबोधित करते हुए अपनी यह प्रसिद्ध कविता पढ़ी थी...

तुझसा लहरों में बह लेता
तो मैं भी सत्ता गह लेता।
ईमान बेचता फिरता तो,
मैं भी महलों में रह लेता।

राजा बैठे सिंहासन पर,
यह ताजों पर आसीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

जिसने तलवार शिवा को दी
रोशनी उधार दिवा को दी
पतवार थमा दी लहरों को
खंजर की धार हवा को दी
अग-जग के उसी विधाता ने,
कर दी मेरे आधीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
(पूरी कविता कमेंट में देखिए)

क्योंकि राज्यसभा की सीट ना मिलने पर तड़प रहे, छटपटा रहे जनलोकपाली गवइय्ये कुमार विश्वास को पिछले 4-5 दिनों से अपने कवि होने का ढोल पीटते हुए देखा। खुद को दिनकर से जोड़ने की शातिर कोशिशें करता हुआ देखा तो सोचा कि... एक गवइय्ये और कवि का फर्क लिख ही डालूं।
07/01/2012